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डॉ. अलका पांडेय की पुस्तका “रेत के महल” का हुआ लोकार्पण, पुस्तक चर्चा और काव्य गोष्ठी का साथ कार्यक्रम संपन्न

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नवी मुंबई। अखिल भारतीय अग्निशमंच के तत्वावधान में 10 दिसंबर 2025 नवी मुंबई सानपाड़ा स्थित होटल हाईवे व्यू शिकारा रेस्टोरेंट में डॉ अलका पांडेय की 15 वी पुस्तक कहानी संग्रह “रेत का महल” के लोकार्पण समारोह में अध्यक्ष दयानंद तिवारी, मुख्य अतिथि मंजू लोढ़ा, विशेष अतिथि रामकुमार पाल, प्रमुख वक्ता पवन तिवारी, वक्ता सेवा सदन, वक्ता कनक लता तिवारी और वक्ता अश्विन पांडे रहे। कार्यक्रम में सत्कार मूर्ति अलका पांडे, प्रकाशक रामकुमार त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार प्रेमेंद्र सिंह, कमलेश गुप्ता की उपस्थिति रही और मंच संचालन कुमार जैन ने किया।
इस पुस्तक पर चर्चा करते हुए समारोह अध्यक्ष दयानंद तिवारी ने कहा कि “रेत का महल” संस्कारों की धरोहर है, इस किताब को पढ़ना चाहिए। सभी कहानियों के केंद्र में स्त्री है जो धोखा खाती है पर टूटती नहीं, अपने आप पर विश्वास कर आगे कदम बढ़ाती है क्योंकि इसमें अलका जी ने कहानी के साथ-साथ सकारात्मक परिणाम भी दिए हैं। यदि कोई हताश होता है तो उसे हताशा से उभरने की भी प्रेरणा मिलती है तो यह कहानी एक नया दृष्टिकोण देगी पाठक को। सभी कहानियां अच्छी है और पठनीय है।
पवन तिवारी ने कहा कि इस किताब में 18 कहानी है कुछ कहानियां बहुत अच्छी हैं कुछ संस्मरण है, सभी कहानियाँ संवेदनाओं से भरी है। यह कहानियां कल्पित नहीं यथार्थ से जुड़ी हुई है और इन कहानियों से एक नया दृष्टिकोण मिलती है। मैं अलका पांडेय में एक नई संभावनाएं देख रहा हूं।

सेवा सदन ने कहा कि यह सारी कहानियां तीखे तेवर की हैं अगर इंसान ठान ले तो वह “रेत का महल” भी बना सकता है जो एक जुनून और लगन है।
“हंसी खुशी और मानव मन की व्यथा शब्दों से सावरकर बन जाती है कथा” रेट का महल इसी की गाथा है।

कनक लता तिवारी ने कहा कि सभी कहानी जीवन के अनुभव से निकली है जब हम कहानी पढ़ते हैं तो उसकी पीड़ा भावनाओं को महसूस करते हैं अलका जी ने रेत के महल में रिश्तों की नाजुकता को बड़े ही सुंदर ढंग से दिखाया है।
अश्विन पांडे ने कहा मैंने इस पुस्तक की सभी कहानियां तो पढ़ी नहीं है पर जो कहानी पढ़ी है और जो मैंने देखा है तो यह कोई भी कहानी कल्पित नहीं है यह यथार्थ से जुड़ी हुई है और मैं उन दृश्यों का उन बातों का साक्षी भी रहा हूं।
अलका पांडेय ने कहा कि समाज सेवा करते हुए मैंने जो देखा जो समझा समाज की विसंगतियों को जो मैंने महसूस किया उनको मैंने अपने शब्दों और कल्पनाओं के जरिए विस्तार देकर एक कहानी का रूप दिया। क्योंकि लेखक वही है जो अपने आसपास देखता है, महसूस करता है। उन्हीं को वह अपने कलम से कलमबद्ध कर एक रचना का रूप देता है। तो मैंने कुछ नया नहीं किया मैंने जो समाज में देखा महसूस किया वही मैं लिखने की कोशिश की है।
कार्यक्रम लोकार्पण के बाद कवि सम्मेलन शुरू हुआ। जिसकी अध्यक्षता भोपाल से आए हुए किशन तिवारी ने की वहीं मुख्य अतिथि ओमप्रकाश तिवारी, विशेष अतिथि रहे अनिल कुमार राही। और वंदना श्रीवास्तव, प्रोमिला शुक्ला, स्नेहा रानी गायकवाड ने अपनी रचनाएं सुनाई।
वंदना श्रीवास्तव, चंद्रिका व्यास, किशन तिवारी, दिलीप ठक्कर, अश्विन पांडे, सेवा सदन प्रसाद, प्रज्वल वागदारी, राकेश मणि त्रिपाठी, पल्लवी रानी, विशंभर दयाल तिवारी, रामस्वरूप साहू, कल्पेश यादव, सुशील शुक्ला नाचीज, अनिल कुमार राही, नंदलाल क्षितिज, पवन तिवारी, अर्चना, पूनम, मीनाक्षी शर्मा, पंकज कविता झा, दुर्गावती गुप्ता, भारती वाडेकर, स्नेह रानी गायकवाड, सुशीला शर्मा, त्रिलोचन सिंह अरोड़ा, प्रोमिला शुक्ला, डॉक्टर दया शुक्ला, यदुवंशी रवि यादव, पीयूष सिंह, रामकुमार, ओमप्रकाश पांडे, ओम प्रकाश सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, डॉक्टर शारदा प्रसाद दुबे, धनंजय राख, डॉ. नीलिमा पांडे, लक्ष्मीकांत कमलनयन रमेश गायकवाड़, आदि ने अपनी शानदार रचनाएं सुनाकर दर्शकों का मन मोह लिया।
अंत में अलका पांडे ने सबका आभार व्यक्त किया और उन्होंने अपने जीवन को बदलने वाली अनीता मेहरा का आभार व्यक्त किया। साथ ही अशोक मेहरा, शिकारा होटल और लोकार्पण के साक्षी बने सभी कवि कवयित्रियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि आप सबके आने से कार्यक्रम सफल हुआ।

  • गायत्री साहू

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