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व्यंग्यात्मक, सामाजिक हिंदी फिल्म “हनीमूनाय नमः” की इम्पा में स्क्रीनिंग

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मुंबई। सटायर कॉमेडी फिल्में बॉलीवुड में जब भी बनती है, समाज का एक वर्ग उससे जुड़ा हुआ महसूस करता है। साधारण सी कहानी पर बनी फिल्म चर्चा का विषय बन जाती है। कई फिल्मकार अपने अनूठे कंटेंट के कारण अपने समकालीन निर्देशक के बीच सबसे ज्यादा चर्चित होते हैं और विभिन्न पुरस्कार पर अधिकार प्राप्त करते हैं। शीघ्र ही रिलीज होने वाली फिल्म “हनीमूनाय नमः” ने भी कई अवार्ड अपने नाम कर लिया है। हाल ही में इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग मुंबई में अंधेरी पश्चिम स्थित इम्पा में रखी गई। यह एक सटायरिकल फिल्म है जिसकी पृष्ठभूमि उत्तराखंड राज्य पर केंद्रित है। पहाड़ पर बसे ऐसे गांव जहां आज भी सुविधाओं का अभाव है और ग्रामीण मोबाइल नेटवर्क की पहुंच से दूर हैं। फिल्म को राजनीतिक माहौल से भी जोड़ा गया है। फिल्म में गंभीरता से परे हास्य को ज्यादा महत्व देने का प्रयास किया गया है।

शिवाक्षय एंटरटेनमेंट के बैनर तले नवांकुर फिल्म्स के सहयोग से बनी इस फिल्म के निर्माता अक्षय बाफिला और अक्षय देसाई हैं जबकि निशांत भारद्वाज ने निर्देशन की बागडोर संभाली है। फिल्म के सह निर्माता ध्रुव राठौड़, हेमलता भारद्वाज, भास्कर पेठशाली हैं। फिल्म के कलाकारों में अक्षय बाफिला, सोनम ठाकुर, हेमलता भारद्वाज, निशांत भारद्वाज, मीनाक्षी, दीपक गुप्ता, कमल किशोर तिवारी, डी.एस. सिजवाली (सोनू), आलोक वर्मा, राजन पुरी, मोहित शर्मा, जीत जांगिड़, राजेंद्र गोस्वामी, ललित पंत, अमन सिंह राठौर, श्याम सुंदर शर्मा, दीपक तिरुवा, किंशुक पांडे, अंजलि पारीक, अनुज कुमार, मोहित तिवारी, भास्कर पेठशाली, जसवंत बाफिला, इंद्रजीत बाफिला, हीना बाफिला, अरविंद भटनागर, अमरनाथ सिंह नेगी, नरेश बिष्ट, पंकट कार्की, गीता बिष्ट, चंद्रप्रकाश तत्रारी, कैलाश चन्याल, विनोद कुमार का नाम उल्लेखनीय है। स्क्रीनप्ले और डायलॉग निशांत भारद्वाज ने लिखे हैं। म्यूजिक और बैकग्राउंड म्यूजिक अक्षय बाफिला का है। फिल्म में मधुर गीत हैं जो कहानी को आगे बढ़ाते हैं। इसमें उत्तराखंड का एक लोकगीत भी शामिल है। वहीं इस फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ललित कोहली, एडिटर जीत सिंह मेहता, डीओपी पार्थ जोशी/सिनेमो सनी और प्रचारक अमिताभ रंजन हैं।

फिल्म की कहानी शुरू होती है उत्तराखंड के पहाड़ में बसे गांव के एक किसान के बेटे मोना से जो पढ़ा लिखा भोला इंसान है, उसका विवाह पड़ोस के गाँव की लड़की वर्षा से होने वाली है। मोना अमेरिका में जॉब करने वाले अपने दोस्त को निमंत्रण देने के लिए फोन करता है तो वह आने में असमर्थता जताते हुए, मोना को हनीमून की रस्म ठीक से मनाने की सलाह देता है। इससे पहले कि मोना हनीमून के बारे में और जानकारी माँग पाता, नेटवर्क चले जाने की वजह से कॉल कट जाता है। मोना के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी होती है: यह “हनीमून की रस्म” असल में क्या है और इसे कैसे मनाया जाता है? गाँव में किसी को भी इसके बारे में नहीं पता। एक गांव से दूसरे गांव की महिलाओं के बीच भी चर्चा का विषय बन जाता है। पहाड़ी गांव की देवी से इस बला से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना किया जाता है। जब गांव के पंडित से पूछा जाता है तो वह भी असमंजस में पड़ जाता है। आसपास के पूरे गांव में यह बात फैल जाती है। पंचायत बुलाए जाने पर सब अपने-अपने तरीके से इस पर चर्चा करने लगते हैं। हनीमून की रस्म एक बड़े मुद्दे का रूप धारण कर लेती है। वहीं राजनीति से जुड़े लोग इसका लाभ उठाने के लिए षडयंत्र भी रच डालते हैं इससे मोना और वर्षा का विवाह भी नामुमकिन सा हो जाता है। फिर एक दिन मोना को एक ऐसी सच्चाई का पता चलता है जो एक अंधविश्वास का जड़ होता है और वह अपने उपाय के साथ सूझबूझ से मामला को शांत करता है। लेकिन इस आपाधापी में गांव की परंपरा, आस्था और विश्वास के साथ साथ राजनीति पर किसी प्रकार की आंच नहीं आती।

-संतोष साहू

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