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गुरु पूर्णिमा उत्सव पर कविता

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गुरु पूर्णिमा उत्सव

गुरु पूर्णिमा पर्व आया है मित्रों,
करें हम समर्पण,जो क्षमता हमारी ।
परम पूज्य भगवाध्वज, गुरु है हमारा,
बनी आस इससे ही, शुचि कीर्ति न्यारी ।।

नहीं कोई मामूली, यह ध्वज है सच में,
जुड़ी इससे स्वयंसेवकों की कहानी ।
चलें दिव्य पथ पर बटोही सहर्षित,
अमिट साधना की,परम प्रिय निशानी ।।

प्रचारक अनेकों लगे हैं अहर्निश,
विविध क्षेत्रों में,काम उनका है जारी ।
है परिवार विस्तृत, सभी हैं समर्पित,
है संतों का जीवन और कर्तव्य भारी ।।

समर्पण की धनराशि उनके लिए है,
ना करते कभी,स्वसुखों की जो चिन्ता ।
जो घर-बार छोड़े हमारे लिए हैं,
रखें ध्यान उनका, हैं जब तक हम जिन्दा ।।

पूरे वर्ष में, मात्र एक बार ही तो,
है मिलता हमें, ऐसा मौका सुनहरा ।
हो उत्साहित, आगे बढ़ें , राष्ट्रहित हम,
करें ध्वज का पूजन, नहीं वक्त ठहरा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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