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पार्किंसन रोग के प्रभावी उपचार के साथ जागरूकता के लिए वॉकहार्ट हॉस्पिटल्‍स, मुंबई सेंट्रल के डॉक्टर और पेशेंट आए साथ

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मुंबई। वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स, मुंबई सेंट्रल ने पार्किंसन रोग के प्रभावी इलाज और जागरूकता के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन किया, जिसमें डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन तकनीक की जीवन बदलने वाली भूमिका को सामने लाया गया। इस कार्यक्रम में अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट्स, न्यूरोसर्जन्स, अस्पताल प्रबंधन और मरीजों के परिजन शामिल हुए। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य सफल मरीज की प्रेरणादायक कहानी के माध्यम से डीबीएस सर्जरी से जुड़ी भ्रांतियों को तोड़ना और इसके लाभ को सरल भाषा में समझाना था।

इस कार्यक्रम में 60 वर्षीय महेश शेट्टी की कहानी साझा की गई, जो पिछले सात वर्षों से पार्किंसन से जूझ रहे थे। लगातार झटकों और चलने-फिरने में कठिनाई के चलते वे उच्च मात्रा की दवाओं पर निर्भर हो गए थे। वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स, मुंबई सेंट्रल के डॉ. मनीष बालदिया (कंसल्टेंट फंक्शनल न्यूरोसर्जन) द्वारा किए गए डीबीएस सर्जरी के बाद शेट्टी अब बिना सहारे चल पा रहे हैं और दवा की मात्रा 1200 मिलीग्राम से घटकर मात्र 30 मिलीग्राम रह गई है—यानि 97.5% तक की उल्लेखनीय कमी।

शेट्टी ने भावुक होकर कहा,”वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स की देखभाल ने मुझे मेरी आज़ादी वापस दिलाई है। इलाज के दौरान डॉक्टरों और पूरे स्टाफ ने जिस मानवीय संवेदनशीलता के साथ मेरा साथ दिया, वह अविस्मरणीय है।”

डॉ. मनीष बालदिया ने बताया,”यह मामला आधुनिक डीबीएस तकनीक की जबरदस्त ताकत को दर्शाता है। आज हम एआई -संचालित ब्रेन-सेंसिंग तकनीक और डायरेक्शनल इलेक्ट्रोड्स की मदद से बुज़ुर्गों को भी बेहद सटीक और सुरक्षित इलाज दे पा रहे हैं।”
सत्र में बुज़ुर्गों के बीच ब्रेन सर्जरी को लेकर व्याप्त झिझक और भ्रांतियों पर भी चर्चा हुई। डॉ. बालदिया ने स्पष्ट किया कि डीबीएस कोई स्थायी या विनाशकारी सर्जरी नहीं है, बल्कि यह एक न्यूनतम इनवेसिव (कम कट-फट वाली) और पूरी तरह रिवर्सेबल प्रक्रिया है, जो एआई तकनीक से नियंत्रित होती है। यह मस्तिष्क की तरंगों को पहचानकर वास्तविक समय में सटीक स्टिम्युलेशन देती है, जिससे मैनुअल एडजस्टमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स, मुंबई सेंट्रल के सेंटर हेड डॉ. वीरेंद्र चौहान ने कहा, “हमारा प्रयास सिर्फ उपचार करना नहीं, बल्कि रोगी को विश्वास, आराम और सही जानकारी भी देना है। डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन इसका सशक्त उदाहरण है, एक ऐसी प्रक्रिया जो सुरक्षित तरीके से पार्किंसन रोगियों को गरिमा, गतिशीलता और आत्मनिर्भरता लौटाती है।

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