मुंबई में आयोजित बांस सम्मेलन में राज्यपाल, मंत्री, उद्यमियों और 13 राज्यों के किसानों ने किया मंथन

मुंबई, 27 सितंबर। “आज का विकास कल के लिए खतरा नहीं बनना चाहिए।” इस संदेश के साथ महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने बांस आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने का आह्वान किया।
विश्व बांस दिवस के अवसर पर पवई स्थित द वेस्टिन मुंबई होटल में रविवार को ‘बांस अर्थव्यवस्था एवं सततता सम्मेलन-2026’ का आयोजन किया गया। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने बांस के उत्पादन, उपयोग और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। पूरे दिन चले इस सम्मेलन में महाराष्ट्र सहित 13 राज्यों के किसान, किसान नेता, उद्यमी, शोधकर्ता, कारीगर और नीति-निर्माता शामिल हुए। सम्मेलन का समापन राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे की उपस्थिति में हुआ।
लातूर की द फीनिक्स फाउंडेशन, मुंबई की टेफ्लाज और मित्रा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन के प्रेरणास्रोत ‘बांस मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध पाशा पटेल हैं। वे राज्य कृषि मूल्य आयोग के अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री पर्यावरण एवं सतत विकास टास्क फोर्स के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।
उद्घाटन सत्र में फलोत्पादन, रोजगार गारंटी योजना एवं खारभूमि विकास मंत्री भरतशेठ गोगावले, गुजरात के पूर्व मंत्री भूपेंद्रसिंह चुडासमा, केपी ग्रुप के संस्थापक-अध्यक्ष डॉ. फारूक पटेल, मौलाना हुजैफा वस्तानवी तथा टेफ्लाज के प्रबंध निदेशक आदिल सिंह मंच पर उपस्थित थे।

राज्यपाल ने देखा बांस उत्पादों का प्रदर्शन
सम्मेलन स्थल पर बांस से निर्मित विभिन्न उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसमें बांस की लकड़ी, कपड़े, शॉल, कप-प्याले, बर्तन, आभूषण तथा प्लास्टिक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जा सकने वाले उत्पाद प्रदर्शित किए गए।
राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने मंच पर जाने से पहले प्रदर्शनी का दौरा किया। उन्होंने करीब 20 मिनट तक विभिन्न स्टॉलों पर रुककर उत्पादकों से बातचीत की। बेंगलुरु के महादेव चिक्कण्णा के स्टॉल पर उन्होंने प्लास्टिक के विकल्प के रूप में तैयार किए गए बांस उत्पादों की जानकारी ली और पूछा कि इन उत्पादों के लिए आवश्यक मशीनरी कहां तैयार की जाती है। उन्होंने त्रिपुरा में भी इसी प्रकार का उद्योग स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की।
‘बांस लगाएं, बांस का उपयोग करें’
उद्घाटन भाषण में राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने कहा, “बांस लगाएं, बांस का उपयोग करें और बांस का व्यावसायीकरण करें। इससे अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पर्यावरण की रक्षा होगी और पृथ्वी बचेगी।”
उन्होंने कहा कि हमारे दैनिक जीवन की शुरुआत ही प्लास्टिक के टूथब्रश से होती है। इसका वास्तविक विकल्प बांस हो सकता है। इसके लिए बांस पर अधिक शोध, जनजागृति और व्यापक स्तर पर व्यावसायीकरण की आवश्यकता है।
त्रिपुरा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गडचिरोली जैसे जिले बांस की मजबूत मूल्य श्रृंखला विकसित कर सकते हैं। इससे किसानों और जंगल पर निर्भर समुदायों को आर्थिक आधार मिल सकता है।
‘किसान बांस जैसा ही है’
मंत्री भरतशेठ गोगावले ने किसानों से बांस की खेती की ओर रुख करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा, “जब तूफान आता है तो बांस झुकता है, लेकिन टूटता नहीं। महाराष्ट्र का किसान भी बांस जैसा ही है। सूखा हो, अतिवृष्टि हो या भूस्खलन, वह झुका जरूर है, लेकिन कभी टूटा नहीं।”
उन्होंने बताया कि रोजगार गारंटी योजना के तहत बांस की खेती के लिए किसानों को तीन वर्षों में प्रति हेक्टेयर साढ़े सात लाख रुपये तक की सहायता मिलती है। उनके अनुसार, एक बार लगाया गया बांस अगले 30 से 40 वर्षों तक आय का स्रोत बन सकता है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने अक्टूबर 2025 में बांस उद्योग नीति को मंजूरी दी है। इस नीति के तहत 50 हजार करोड़ रुपये के निवेश, पांच लाख से अधिक रोजगार के अवसर और 15 बांस क्लस्टर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। एशियाई विकास बैंक के सहयोग से बांस की खेती की एक बड़ी परियोजना भी आकार ले रही है।
‘अन्नदाता अब ऊर्जादाता बने’
पाशा पटेल ने कहा, “कार्बन का स्तर 430 पीपीएम तक पहुंच गया है। यदि यह 450 पीपीएम तक पहुंच गया तो मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। पृथ्वी के गर्भ से ऊर्जा निकालने के बजाय जमीन की सतह पर ऊर्जा पैदा करनी होगी। अन्नदाता किसान अब ऊर्जादाता बनना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि पीपल और बरगद जैसे वृक्षों को विकसित होने में करीब 50 वर्ष लगते हैं। यदि 33 प्रतिशत हरित आवरण का लक्ष्य तेजी से हासिल करना है तो बांस महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।
डॉ. फारूक पटेल ने कहा, “यह पृथ्वी हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली है। हमने इसे अगली पीढ़ी से कर्ज के रूप में लिया है।”
उन्होंने बांस क्षेत्र में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए केपी ग्रुप की ओर से हर वर्ष पुरस्कार देने की घोषणा की।
तकनीकी सत्रों में बांस उद्योग के पांच स्तंभों पर चर्चा
दोपहर में आयोजित तकनीकी सत्रों में राज्य की बांस उद्योग नीति के पांच प्रमुख स्तंभों पर विस्तृत चर्चा की गई। बांस से लकड़ी, कपड़ा, ऊर्जा और कार्बन क्रेडिट इसके प्रमुख विषय रहे।
सम्मेलन में बताया गया कि भारत हर वर्ष करीब 90 हजार करोड़ रुपये की लकड़ी का आयात करता है। इस आयात को कम करने के लिए बांस से तैयार लकड़ी एक विकल्प बन सकती है।
राज्य में बांस से कपड़ा बनाने का उत्पादन शुरू हो चुका है, लेकिन इसके लिए आवश्यक धागा अभी भी चीन से आयात किया जाता है। अब यह धागा महाराष्ट्र में ही तैयार करने का संकल्प व्यक्त किया गया।
ऊर्जा सत्र में वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों को प्राप्त भूमि पर चर्चा हुई। भूमि के कुछ हिस्से को बांस की खेती के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव भी रखा गया।
सत्र में यह भी बताया गया कि एक किलो कोयले और एक किलो बांस का ऊष्मीय मूल्य लगभग समान होता है। ऐसे में बांस थर्मल पावर परियोजनाओं के लिए एक विकल्प बन सकता है।
समापन सत्र में ‘बांस पटेल’ की चर्चा
समापन सत्र में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने बांस को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत और संपत्ति बताया।
उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि पाशा पटेल दिन-रात केवल बांस के बारे में सोचते हैं, इसलिए उन्हें ‘बांस पटेल’ कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। उनकी इस टिप्पणी पर सभागार में हंसी गूंज उठी।
उन्होंने कहा कि हर हाथ को काम देने के लिए बांस एक बेहतरीन उद्योग है। उन्होंने सुझाव दिया कि होटल में लगाई जाने वाली प्रदर्शनियों का लाभ गांवों के किसानों तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्रदर्शनियां साप्ताहिक बाजारों और मेलों में भी आयोजित की जानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि राजस्थान में प्रत्येक वृक्षारोपण अभियान में बांस को शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
पाशा पटेल ने बताया कि लातूर जिले में वन क्षेत्र मुश्किल से आधा प्रतिशत है। दुनिया में यह एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां रेलवे के माध्यम से पीने का पानी लाना पड़ा है। राजस्थान की स्थिति भी कुछ हद तक ऐसी ही होने के कारण वहां बांस की खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि 1927 के ब्रिटिशकालीन वन कानून में बांस को पेड़ की श्रेणी में रखे जाने के कारण किसानों ने बांस लगाना बंद कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांस को घास का दर्जा दिया और इसके बाद बांस की खेती को बढ़ावा देने का रास्ता आसान हुआ।
चीनी और खाद्य तेल उद्योग से जुड़े अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि जब बांस से सेल्यूलोसिक इथेनॉल प्रतिस्पर्धी दरों पर तैयार होने लगेगा, तब देश में बांस का उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है।
समापन समारोह में गुजरात के मंत्री ईश्वरभाई पटेल, भारतीय किसान यूनियन के नेता यदुवीर सिंह और महादेव चिक्कण्णा भी उपस्थित थे।
सम्मान समारोह और पुस्तिकाओं का विमोचन
सम्मेलन के उद्घाटन समारोह, तकनीकी सत्रों और समापन कार्यक्रम में विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों का सम्मान किया गया।
उद्घाटन सत्र में पिछले वर्ष आयोजित बांस सम्मेलन की रिपोर्ट पर आधारित पुस्तिका का विमोचन किया गया। डॉ. नामदेव कापसे की पुस्तिका का भी राज्यपाल तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों के हाथों विमोचन हुआ।
सम्मेलन का दूसरा दिन सोमवार को इथेनॉल विषय पर आयोजित विचार-विमर्श सत्र के लिए निर्धारित किया गया है।

