Literature

कविता

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जन-गण-मन का

मैं! लोकतंत्र—लोकतंत्र—लोकतंत्र हूँ।
जन-गण-मन की सफलता का मूल मंत्र हूँ॥

कर्मवीरों के लिए मैं!सहज-सरल हूँ,
धर्मधीरों के लिए मैं! सहज-सरल हूँ।
सर्वत्र एकोंकार देखने वाले सभी,
सत्यवीरों के लिए मैं! सहज-सरल हूँ।
मैं! निस्वार्थता का निर्माण-यंत्र हूँ॥

पंचतत्त्व ही सभी के, जीवनाधार हैं।
धरती पर कोई भी नहीं, निराधार है।
प्रकृति ने ही, रचना की है सभी की,
प्रकृति ही सभी की, सर्वाधार है।
मैं! प्रकृति की प्रभुता का सुमंत्र हूँ॥

श्रीराम ने अपनी शक्ति बनाया मुझको,
कठिन रास्तों से लंका तक जाने के लिए,
असंभव को संभव बनाने के लिए,
श्रीराम ने अपनी युक्ति बनाया मुझको।
मैं! सर्व-सिद्धियों से पोषित श्री-यंत्र हूँ॥

जनता ने मेरे लिए अनेकों, बलिदान दिए।
दुष्टताओं ने युगों तक, षड्यंत्र किए।
लोकतंत्र का स्वराज लाने के लिए,
भारतवीरों ने अनेकों, दुख-दर्द सहे।
मैं! भारत के लोकतंत्र का गणतंत्र हूँ।
मैं गणतंत्र—गणतंत्र—गणतंत्र हूँ॥

— श्रीमती पूजा श्री

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