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भारत की खाद्य सुरक्षा, महिला आर्थिक सशक्तीकरण और डिजिटल परिवर्तन पर विशेष जोर

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भारत की खाद्य सुरक्षा, महिला आर्थिक सशक्तीकरण और डिजिटल परिवर्तन पर विशेष जोर

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में सांसद डॉ. हेमंत सवरा ने भारत का पक्ष रखा

पालघर, 23 अक्टूबर। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 19 अक्टूबर 2026 को आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा की द्वितीय समिति और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) की संयुक्त बैठक में भारत ने खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और डिजिटल सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए निवेश के महत्व पर जोर दिया। भारत के विकास अनुभव से स्पष्ट होता है कि इन प्राथमिकताओं का लोगों की आजीविका के साथ-साथ आर्थिक एवं जलवायु संबंधी संकटों का सामना करने की उनकी क्षमता पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है।

इस बैठक में भारत की ओर से तीन प्रमुख विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए।

1. कृषि निवेश, खाद्य सुरक्षा और पोषण

भारत ने कहा कि कृषि क्षेत्र में निवेश से छोटे और सीमांत किसानों को सहायता मिलनी चाहिए, उनकी आय में वृद्धि होनी चाहिए तथा सभी लोगों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन किफायती दरों पर उपलब्ध होना चाहिए।

भारत ने जलवायु परिवर्तन और बाजार में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम कृषि प्रणालियों के निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से विकासशील देशों को कृषि तकनीक, जलवायु संबंधी जानकारी और परामर्श सेवाएं सुलभ एवं किफायती दरों पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि किसान जोखिमों का बेहतर प्रबंधन कर सकें और कृषि उत्पादकता बढ़ा सकें।

भारत ने स्पष्ट किया कि खाद्य सुरक्षा में पोषण को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। भारत की पीएम पोषण (PM POSHAN) योजना के तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

इसके अलावा, भारत द्वारा मोटे अनाज (मिलेट्स) को बढ़ावा देना पारंपरिक, पौष्टिक और जलवायु के अनुकूल फसलों के महत्व को रेखांकित करता है।

भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में खाद्य सुरक्षा के उद्देश्य से सार्वजनिक खाद्यान्न भंडारण के मुद्दे पर स्थायी समाधान की आवश्यकता को भी दोहराया, ताकि विकासशील देश जरूरतमंद वर्गों को किफायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली योजनाओं को जारी रख सकें।

2. महिला-केंद्रित विकास और आर्थिक समावेशन

भारत ने महिलाओं के नेतृत्व में विकास को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सहायता और निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।

भारत के अनुभव के अनुसार, बुनियादी बैंक खाते, डिजिटल पहचान और मोबाइल कनेक्टिविटी को एकीकृत करने से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाना संभव हुआ है।

भारत के राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन कार्यक्रमों के अंतर्गत खोले गए बैंक खातों में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (बचत समूहों) और महिला उद्यमियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने से वित्तीय समावेशन को स्थायी आजीविका तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता में बदला जा सकता है।

3. डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा

भारत ने डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को विकास क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण निवेश के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

साझा और परस्पर जुड़कर काम करने वाली डिजिटल प्रणालियों से सरकारी सेवाओं की आपूर्ति में सुधार किया जा सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में नए अवसरों का विस्तार हो सकता है।

विशेष रूप से महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के लिए किफायती इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल साक्षरता तथा ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी उपायों को वित्तीय सहायता के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल सेवाओं का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंच सके।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भविष्य की दिशा

भारत ने कहा कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण को एक साथ जोड़ना आवश्यक है।

भारत दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) के माध्यम से अपने विकास संबंधी अनुभवों को अन्य विकासशील देशों के साथ साझा करना जारी रखेगा।

भारत की ओर से अपना पक्ष रखते हुए पालघर लोकसभा क्षेत्र के सांसद डॉ. हेमंत विष्णु सवरा ने स्पष्ट किया कि वित्तीय सहायता का सामूहिक उद्देश्य ऐसा विकास सुनिश्चित करना होना चाहिए, जो आम लोगों तक पहुंचे, उनकी संकटों से निपटने की क्षमता को मजबूत करे और सतत एवं समावेशी अवसरों का निर्माण करे।

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