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अनोखी और रोचक कहानी पर बनी हिंदी फिल्म “हनीमूनाय नमः” शीघ्र होगी प्रदर्शित

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मुंबई। बॉलीवुड में आजकल कंटेंट सिनेमा और कुछ अलग प्रकार के विषयों पर फिल्म बनाने की होड़ लगी हुई है। हनीमूनाय नमः भी एक ऐसी ही फिल्म है जो न केवल अपने टाइटल के अनुरूप अलग है बल्कि कहानी भी रोचक है। दरअसल “हनीमूनाय नमः” एक सटायरिकल फिल्म है जो समाज में फैली राजनीतिक मौकापरस्ती और जनता की सीधी-सादी सोच को हास्य के ज़रिए दिखाने की कोशिश करती है।

शिवाक्षय एंटरटेनमेंट के बैनर तले नवांकुर फिल्म्स के सहयोग से बनी फिल्म को अक्षय बाफिला और अक्षय देसाई ने प्रोड्यूस किया है जबकि निशांत भारद्वाज ने निर्देशन किया है। फिल्म के सह निर्माता ध्रुव राठौड़, हेमलता भारद्वाज, भास्कर पेठशाली हैं। फिल्म के कलाकारों में अक्षय बाफिला, सोनम ठाकुर, हेमलता भारद्वाज, निशांत भारद्वाज, मीनाक्षी, दीपक गुप्ता, कमल किशोर तिवारी, डी.एस. सिजवाली (सोनू), आलोक वर्मा, राजन पुरी, मोहित शर्मा, जीत जांगिड़, राजेंद्र गोस्वामी, ललित पंत, अमन सिंह राठौर, श्याम लाल शर्मा, दीपक तिरुवा, किंशुक पांडे, अंजलि पारीक, अनुज कुमार, मोहित तिवारी, भास्कर पेठशाली, जसवंत बाफिला, इंद्रजीत बाफिला, हीना बाफिला, अरविंद भटनागर, अमरनाथ सिंह नेगी, नरेश बिष्ट, पंकट कार्की, गीता बिष्ट, चंद्रप्रकाश तत्रारी, कैलाश चन्याल, विनोद कुमार का नाम उल्लेखनीय है। स्क्रीनप्ले और डायलॉग निशांत भारद्वाज ने लिखे हैं। म्यूजिक और बैकग्राउंड म्यूजिक अक्षय बाफिला का है। फिल्म मे कई प्यारे गीत हैं जो कहानी को आगे बढ़ाते हैं. इसमे उत्तराखंड का एक लोकगीत भी शामिल है।

फिल्म की कहानी उत्तराखंड के एक किसान के बेटे मोना की
है, जिसकी शादी पड़ोस के गाँव की लड़की वर्षा से होने वाली है। वह अपने दोस्त, जो अमेरिका में रहता है, को शादी में बुलाता है। दोस्त, आने में असमर्थता जताते हुए, मोना को हनीमून की रस्म ठीक से मनाने की सलाह देता है। इससे पहले कि मोना हनीमून के बारे में और जानकारी माँग पाता, नेटवर्क चले जाने की वजह से कॉल कट जाता है। मोना के लिए एक प्रॉब्लम खड़ी होती है: यह “हनीमून की रस्म” असल में क्या है और इसे कैसे मनाया जाता है? उसके दोस्तों को भी नहीं पता; गाँव में किसी को भी इसके बारे में नहीं पता। जब यह बात मोना की माँ तक पहुँचती है, तो इसका रूप और भी ज़्यादा बदल चुका होता है। पुजारी से पूछने पर पता चलता है कि उसे भी इस रस्म के बारे में कुछ नहीं पता। अब क्या किया जाए? यह बात दुल्हन के परिवार तक पहुंच जाती है। उन्हें पता चलता है कि अगर दूल्हे की हनीमून की रस्म नहीं की गई, तो शादी के बाद दुल्हन की मां मर सकती है, इसलिए वे शादी से मना कर देते हैं। पंचायत बुलाई जाती है, लेकिन पंचायत में भी किसी को इस रस्म के बारे में पता नहीं होता। सब अपने-अपने तरीके से इस पर चर्चा करने लगते हैं। हनीमून की रस्म पूरे राज्य के लिए एक मुद्दा बन जाती है। इसका फ़ायदा उठाकर, परंपरा पार्टी मोना के पिता को एमएलए का कैंडिडेट बनाती है, और सेक्युलर पार्टी वर्षा के पिता को कैंडिडेट बनाती है। मोना परेशान है क्योंकि शादी का टॉपिक इस अफ़रा-तफ़री में पूरी तरह से खो गया है। फ़िल्म कई दिलचस्प और मज़ेदार पलों से गुज़रती है, जो कॉमेडी के ज़रिए हमारे समाज के कई पहलुओं को दिखाती है। यह हमारे समाज में मौजूद पारंपरिक सोच, अंधविश्वास और मासूमियत को दिखाती है।

फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ललित कोहली, एडिटर जीत सिंह मेहता, डीओपी पार्थ जोशी/सिनेमो सनी हैं।

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