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“प्रेम, करुणा, भाईचारा, आत्म मंथन से, आयेगा” कवि कैलाशनाथ गुप्ता की कविता

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प्रेम, करुणा, भाईचारा, आत्म मंथन से, आयेगा ।

प्रेम, करुणा, भाईचारा, घर – घर में, तब आयेगा,
अपने पन का, भाव जगे जब, ज्ञान प्रभू का, पायेगा ।
सारी खल कत, एक खुदा की, नज़र खुदा, तब आयेगा,
मुर्शद के, तलियों का इशारा, समझ कोई, जब पायेगा ।।

एक को जानो, एक को मानो, एक जब, हो जायेगा,
प्रेम, करुणा, भाईचारा, आत्म मंथन, से आयेगा ।

मंथन करें सब, आत्म मंथन, सही मार्ग, मिल जायेगा,
जीवन पथ के, सफर को बेशक, रहवर सहज, बनायेगा ।
रहवर बिना, जीवन भर चलना, अंत काल पछताएगा,
ब्रह्मज्ञान बिना, नहीं है मुक्ति, पुनर्जन्म में, आयेगा ।।

बार – बार जीना, और मरना, हर बार यही, दोहराएगा,
प्रेम, करुणा, भाईचारा, आत्ममंथन से, आयेगा ।

आठों पहर, मंथन में मानव, है भौतिक सुविधा, के अरमान,
कुछ पाएं, कुछ बन जाएं हम, इस पर ही, सब देता ध्यान ।
बनने को, बन जाते बहुत कुछ, पर, बन नहीं पाते , हैं इन्सान,
सतगुरू इंसा बना रहा है, दे कर सब को, ब्रह्म का ज्ञान ।।

ब्रह्म ज्ञान , “कैलाश” मिलेगा, जो दर सतगुरू, के आयेगा,
प्रेम, करुणा, भाईचारा, आत्ममंथन से, आयेगा ।

धन निरंकार जी

कैलाश नाथ गुप्ता

अंधेरी मुंबई महाराष्ट्र
9324673661

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